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Archive for the ‘Hindi’ Category

बे-बस

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थका हारा चढ़ा मैं बस में,
बगल में आकर बैठ गयी वो,
नींद उसकी आँखों में झलकी,
मेरा कन्धा कब बना सिरहाना,
न वो समझी, न मैंने जाना,
उसको उठाने को मन न माना,
मेरा स्टॉप जाने कब निकला,
एक मक्खी परेशां करने लगी,
अखबार से पंखा करता रहा,
टिकट आखिर की ले दी उसकी,
टीटी कहीं उठा न दे उसको,
बस की यात्रा में जिंदगी सजा ली,
सोते में उसके चेहरे पर हँसी,
दिल ले गयी हमारा, कन्धा भी,
जैसे जैसे आखिर स्टॉप आने लगा,
हमारे दिल में टीस सी उठने लगी,
सोचा उठाऊँ उसको, पूछूं नाम,
पर कुछ कर न पाया,
आखिर बस रुक गयी,
आवाज लगी, सब उतरो,
वो उठ गयी, कुछ अनजान,
कंधे से उठी, शर्मिंदा सी,
हम कुछ कहने को हुए,
जो ख्वाब बुने थे बयां करूँ,
वो बाल सही करने लगी,
दुपट्टा भी ठीक किया उसने,
गला ठक रहा था अबतक,
तभी कुछ दिखा हमें,
फलक में शब्द रुक गए,
सारे अरमां खाख हुए,
छुपा हुआ था पल्लू में जो,
हमें दिखा उसका मंगलसूत्र।

Written by arpitgarg

March 9, 2013 at 11:00 pm

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युग

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दिल झर झर कर क्यूँ रोता है?
औ अँखियाँ सूखी सूखी क्यूँ?
जल भर भर कर वो पीता है,
प्यास है पर बुझती ही नहीं।

हैं सासें चढ़ी चढ़ी सी क्यूँ?
मन बैठा सा क्यूँ जाता है?
लब सूखे सूखे लगते हैं,
तन सावन से घबराता है।

दिन ढला ढला क्यूँ रहता है?
रातों को आँख क्यूँ चुँधियाती?
वो मीलों मीलों चलता है,
पर दूरी है घटती ही नहीं।

चढ़ते हैं रंग न होली में?
फुलझड़ी भी फुस्स हो जाती है।
पकवानों की सजी मंडी में,
मन खाने का न करता है।

वो तारे गिनने बैठा था,
एक हाथ खत्म न कर पाया,
सूरज की घनी तपन भी क्यूँ,
ठिठुरन सी देकर जाती है।

दुनिया की रीत परायी है,
लगता है कुछ अजब ग़जब।
हुआ है एक युग का अंत,
वो समझ न पाता है ये सब।।

Written by arpitgarg

February 5, 2013 at 9:01 pm

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वो बातें अधूरी

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सही जाए ना अब यह दूरी,

करनी हैं तुझसे वो बातें अधूरी,

हाथों का मिलना, औ फूलों का खिलना,

वो सर्दी का आना, टटहलना, ठिठुरना,

छुपाकर रखा गुलाब दिया जो,

तेरा मुस्कराना, थोड़ा शर्माना,

साथ आना, साथ जाना,

लम्बा इंतज़ार, भी छोटा लगा था,

खिचड़ी पकाना, रोटी जलाना,

सागर की लहरें, अपना बनाना,

पागलपन कुछ तेरा, कुछ मेरा,

पलक झपकते, होना सवेरा,

लबों का मिलना,  आहों का भरना,

कभी रोना, कभी खिलखिलाना,

ज़माने का जलना, किसको थी परवाह,

सो सो के उठना, उठ उठ के सोना,

तुझे हर कभी गाली देने की आदत,

रूठी थी जब तू, लाया था गोबी,

याद आता है सब ये, उदासी है छाई,

सही जाए ना अब यह दूरी,

करनी हैं तुझसे वो बातें अधूरी।

Written by arpitgarg

January 30, 2013 at 2:32 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

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अध्याय

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गूँज उठी आवाज मेरी,

पसरा सन्नाटा था,

खाली मकान हुआ वो,

घर था मेरा जो कभी।

 

एक एक कर चुना था सब,

एक पल में सब छूट गया,

मुहँ से शब्द न निकले,

गले तक आकर थम गए।

 

वो बस ठहराव न था,

जीवन का था एक अध्याय,

सुहानी यादें, खुशनुमा पल,

आज था जो, बन गया कल।

 

कुछ और भी था जो छोड़ा था,

दूर अपने से उसको किया,

जीवन इतना कठिन होगा,

सोचा न था मैंने कभी।

 

थोड़े दिन की बात है ये,

फिर से कमल खिल जाएगा,

राहें मंजिल को पहुंचेंगी,

मौसम जब रंग बदल लेगा।

 

बस तब तक न भूलना होगा,

लक्ष्य पर रखनी होगी नज़र,

जिस कारण से विरह चुनी हमनें,

उसको सार्थक करना होगा।।

Written by arpitgarg

December 3, 2012 at 4:26 pm

Posted in Poetry

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लहू का सागर बहने दे

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सुबह की पहली किरन,
होती कितनी कपटी है,
सारी दुनिया की बुद्धि,
उस एक ऊँगली में लिपटी है|

एक कश लगा जोर का तू,
छल्लों को फिर उड़ते देख,
सागर की गहराई में भी,
गहराई का वो आलम कहाँ|

सिक्का जो है खोटा वो,
उठा के उसको फेंकें सब,
तुझको तो मैं तब मानूं,
उस सिक्के को चमकाए जब|

हैं दुनिया में कितने इश्वर,
राम रहीम येशु भर भर,
करेगा क्या तू इश्वर चुन,
अपना एक नया ही इश्वर बुन|

रातों को जब सन्नाटा है,
चीर उसे जो पाता है,
उसे ही पूछा जाता है,
नहीं तो दूजा खाता है|

आग को थोड़ा दे और हवा,
थोड़ा तो संयम को कम कर,
उठा हाथ में एक पत्थर,
और हो जाने दे शीशा चूर,

युग नया कभी ना आता है,
तिल तिल के बनाया जाता है,
तिल तिल के अब मरना छोड़,
हवा के रुख को अब तू मोड़|

होली रंगों से कब तक,
क्या ऐसे क्रांति आएगी?
लगा तिलक तू माथे पर,
औ लहू का सागर बहने दे||

Written by arpitgarg

September 15, 2012 at 12:12 am

Posted in Hindi, Prose

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गया काम से तू

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लबों की वो लाली,
पल पल की गाली,
चढ़ती मदहोशी साली,
गया काम से तू|

थी जुराबें गुलाबी,
छंछंनाती पाजेबें,
मोरनी से हैं पंजे,
गया काम से तू|

मटकती सी आँखें,
दिल में हैं झांकें,
हैं नश्तर चलाती,
गया काम से तू|

उलझी सी जुल्फें,
कि थोड़ी तो सुल्झा,
लगाती हैं फांसी
गया काम से तू|

इधर तिल उधर तिल,
थकता ना गिन गिन,
हैं नजरें चुराते,
गया काम से तू|

मजबूर है दिल,
बड़ा है ये कातिल,
जबसे उसे मिल
गया काम से तू||

Written by arpitgarg

September 2, 2012 at 12:16 am

Posted in Hindi, Poetry

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पता चल न पाता कभी

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दिल का धड़कना होता है क्या,
सांसें आखिर कैसे चढ़ जाती है,
नींद रातों की कैसे जाती है गुम,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

लटों की उलझन में फसना है क्या,
डूबकर आँखों में तैरते कैसे हैं,
मार खाने में आता है कैसा मज़ा,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

रात दिन, एक कैसे जाते हैं हो,
भूख लगती है, खा क्यों न पाते हैं हम,
एक चेहरे में पहर कैसे कट जाते हैं,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

रिश्ते नाते सब गैर लगते हैं क्यों,
क्यों बेगाना ज़माना ये हो जाता है,
प्यार भी सबका लानत क्यों लगने लगा,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

सर्द रातों की गर्मी में तपना है क्या,
चंद बातों में दुनिया का बसना है क्या,
चाँद तारे तोड़कर कैसे लाते हैं सब,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

इजहार-ऐ मोहब्बत होती है क्या.
कैसे दर्द-ऐ-जुदाई तड़पा जाती है,
प्यार का रंग खूनी लगता है क्यों,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी||

miao

Written by arpitgarg

March 19, 2012 at 10:29 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

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जीवन जीना क्या है

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कुछ दिन से सोच रहा था कि लिख डालूँ,
आते आते हाथ पे बात रुक जाती थी पर,
कुछ खट्टे मीठे अनुभव हुए हाल में,
उनसे मैंने जाना, जीवन जीना क्या है|

गर उस रोज़ सड़क से मैं गुजरा न होता,
मौत को अपनी बाहों में सिमटा न होता,
खून का रंग लाल कभी जान न पाता,
मृत्यु क्या होती अकाल पहचान न पाता|

उस दिन गर मैं भूखा सोया न होता,
करवट बदल बदल तडपा रोया न होता,
बेकारी क्या होती है, चुभ न पाती,
पी कर पानी भी डकार कभी न आती|

उस दिन उस कुकुर ने नोचा न होता,
मैंने अगर उसे गुस्से से दुत्कारा  न होता,
पता न चल पाता कि अपना होता क्या है,
दुलार दुत्कार में अंतर न कभी मैं पाता|

उस दिन उस पीड़ित को गर छोड़ा न होता,
कराह कि आह को कभी महसूस न पाता,
धूप छाँव पैसे से जो सब एक हुई थी, बदली,
पैरों के छाले क्या होते मैंने आखिर जाना|

सन्नाटे की आहट से मैं गुजरा न होता,
उस सर्द भरी रात में गर ठिठुरा न होता,
नंग, ठण्ड की तपन से मैं वाकिफ न होता,
पल पल लुटने के डर से सहमा न होता|

पर जो कुछ भी हो, आग से गुजर के देखा,
बिन खडाऊं के काटों पर चलकर देखा,
गहरे पानी में सांसों की तड़प को देखा ,
औ चक्की के दो पाटों में पिसकर देखा|

कुछ दिन से सोच रहा था कि लिख डालूँ,
आते आते हाथ पे बात रुक जाती थी पर,
कुछ खट्टे मीठे अनुभव हुए हाल में,
उनसे मैंने जाना, जीवन जीना क्या है||

Written by arpitgarg

February 19, 2012 at 1:26 pm

जबसे गयी हो दूर

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जबसे गयी हो तुम दूर, एक दर्द सा होता है,
होता है क्यों दर्द ये, है मुझे मालूम नहीं,
मालूम मुझे बस इतना है, कि नींद मुझे न आती है,
नींद कभी जो आ जाए, सपनों में याद सताती है||
 
दिन कटते हैं जैसे तैसे, रात काटने को आती,
कैसे काटूं रात ये दिन, मुझे समझ न आता है,
समझदार मैं था तो बहुत, पगला मैं बन बैठा हूँ,
बैठे बैठे, बस सोचूँ ये, किस्मत से मैं क्यों ऐंठा हूँ||
 
वो रास्ते, वो गलियाँ, जिनपर चलते थे हम तुम,
चलना भी दुष्वार हुआ, छाले क़दमों पे पड़ते हैं,
कदम मुझे ले जाते हैं, तेरे दरवाज़े की ओर,
दरवाज़े बंद पड़ जाते हैं, बिन तेरे किस्मत के||
 
तू जब थी बेहोश, वो पल लम्बे थे जीवन के,
एक बेचैनी छाई थी, तड़प रहा था मन ही मन,
तुझे कभी जो दर्द हुआ, चुभन मुझे महसूस हुई,
कब जाने ऐसा होने लगा, मुझसे पहले तू आने लगी||
 
वापस आजा जान तू अब, विरह सहन न होती है,
सहन जाऊंगा दुत्कार तेरी, पास जो तू मेरे होगी,
पास नहीं जो मेरे तू, जीवन जीने की आस नहीं,
इसी आस में बैठा हूँ, की आने वाली तू जल्दी है||

Written by arpitgarg

January 17, 2012 at 9:29 pm

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मानेगा रब

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शाम थी कुछ अनजान,
थम सा गया था समां,
दूर कहीं एक अहाट थी,
दस्तक देने को तयार|

बेरंग जिंदगी थी जो मेरी,
तेरी नजरों को चुभ सी गयी,
हुई तभी से तू इसमें,
रंग भरने को तत्पर|

तेरी मुस्कराहट में ऐसा खोया,
आज तलक न मिल पाया,
डूब डूब कर मैं जानूं,
सच है, कोई ख्वाब नहीं|

परछाई से भी डरता था,
अब हठ कर ऐसा ऐंठा है,
बिन तेरे सब कुछ सून सून,
संग में ही जीवन जीना है|

गोभी का वो फूल नहीं,
दिल था मेरा जो तुझे दिया,
तू रूठ रूठ के मान गयी,
मैं मना मना कर थका नहीं|

एक झल्ली सी पहली बार लगी,
तेरी लट में, मैं अटक गया,
तब कमर पे तेरे हाथ रखा जो,
आज तक वहीँ रखा है देख|

कुछ गम था ऐसी बात नहीं,
कुछ कम था पर जज्बात सही,
कुछ नम फिर तेरे लिए हुआ,
कुछ थम गया, समय था वो|

तेरी गर्दन पे स्नेह किया,
प्यार से तू करहा थी गयी,
मीनू, रिंकू औ पिंकी सब,
जाने कब मेरे अपने हुए|

लबों की तेरी लाली थी,
मेरे लबों पर चमकी देख,
तेरे मुहं का स्वाद भी अब,
मुझको रह रहकर आता है|

साँसों की तेरी गरम हवा,
मेरी साँसों से टकराई जब,
झुक गए सारे नैन तभी,
सीने से तुझको लगा लिया|

छुपा ले अपने आँचल में,
यह दुनिया सब बेगानी है,
संग तेरे जो जीना पड़े मुझे,
वो जीवन मुझे बेमानी है|

एक बार जो थामा हाथ तेरा,
एक बार जो तुझको स्नेह किया,
अनंत तक न छूटेगा अब,
चाहें न मानें सब, मानेगा पर रब||

Written by arpitgarg

January 3, 2012 at 11:31 pm

Posted in Hindi, Love, Personal, Poetry

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